राष्ट्रपति कोविंद प्रक्षेपण के वक्त थे मौजूद
चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण देखने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी थे। कोविंद रविवार शाम ही श्रीहरिकोटा पहुंच चुके थे। 5000 लोगों की दीर्घा में वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, खगोल विशेषज्ञ, शोधकर्ता और विद्यार्थी भी थे।
बाहुबली में खराबी से रुका प्रक्षेपण
अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक ए राजाराजन के अनुसार विभिन्न चरण में जीएसएलवी मार्क-3 के हिस्से चंद्रयान से अलग होते जाएंगे। यह कहां गिरेंगे, इसके लिए केंद्रीय मिशन कंट्रोल टीम निगरानी करती है व उन इम्पैक्ट लोकेशनों की सटीक जानकारी देती है।
किसी हादसे को रोकने और रॉकेट के पाटर्स को अध्ययन के लिए वापस पाना आसान होता है। वहीं प्रक्षेपण से जुड़ा डाटा भी जमा किया जाता।
पर बाहुबली में खराबी से प्रक्षेपण रोकना पड़ा।
अगर सफर शुरू होता तो...
प्रक्षेपण: जुलाई 15 सुबह 02.51 बजे शुरू होना था। 451.91 मीटर प्रति सेकंड वेग के साथ।
पृथ्वी के परिक्रमा पथ पर: जुलाई 15, करीब 02.58 मिनट पर पृथ्वी की सतह से 181 किमी ऊपर पहुंच कर।
चंद्रमा का रुख: प्रक्षेपण के 17वें दिन करता।
चंद्रमा के परिक्रमा पथ पर: 22वें दिन।
चंद्रमा के निकट: 50वें दिन चंद्रमा की सतह से 100 किमी की दूरी पर लैंडर विक्रम की लैंडिंग का था कार्यक्रम।चंद्रयान-2 दुनिया का पहला ऐसा मिशन बन जाएगा जो चांद की दक्षिणी सतह पर उतरेगा। यह वह अंधेरा हिस्सा है जहां उतरने का किसी देश ने साहस नहीं किया है। इससे पहले 2008 में चंद्रयान-1 और 2013 में मार्स ऑर्बिटर मिशन को अंजाम दिया गया था। यह भारत का तीसरा मिशन है। जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल मार्क 3 भारत में अब तक बना सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यह चंद्रयान-2 को चंद्रमा की कक्षा तक ले जाएगा।
मिशन से पहले इसरो अध्यक्ष भी थे उत्साहित
मिशन से पहले इसरो के अध्यक्ष के सिवन ने कहा था कि हमारे काम का सबसे बड़ा उद्देश्य देश, समाज और वैज्ञानिक समुदाय के लिए लाभकारी चीजें तैयार करना है। हम पुरानी हासिल ख्यातियों के भरोसे नहीं रहना चाहते, हम लगातार भविष्य की ओर देखना चाहते हैं और उन चुनौतियों की पहचान करना चाहते हैं जो हमारे काम में आड़े आ सकती हैं। इस प्रकार के मिशन के बारे में सोचने और उसे अमली जामा पहनाने में काफी मेहनत और समन्वय की जरूरत होती है।
वहीं, इसरो के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन ने कहा था कि चंद्रयान-2 भारत का चंद्रमा पर पहला रोबोटिक मिशन है। छह हजार किमी प्रति घंटे की गति से चंद्रमा की परिक्रमा करते लैंडर विक्रम को अपने वेग पर नियंत्रण पाकर चंद्रमा की अनिश्चिता भरी सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करनी होगी। 16 मिनट में यह सब होगा। इसी वजह से यह बेहद जटिल और दुष्कर भी है। देश इस मिशन को देख रहा है। दूसरी ओर भारत मानव को अंतरिक्ष में भेजने और ग्रहों के अन्वेषण के मुहाने पर खड़ा है, यह हमारी नई पीढ़ी और भविष्य के लिए चुनौतियों भरा है, लेकिन भारी संभावनाओं को खोलेगा।

