आर. पी.पी.न्यूज़
संवाददाता नूर मोहम्मद
भाजपा सरकार में व्याप्त घमंड और अज्ञानता की वजह से गहराया “आर्थिक संकट”
सरकार के पास न तो कोई योजना और न ही विकास की कोई रणनीति
45 साल में सबसे ऊँची बेरोज़गारी की दर आने वाली त्रासदी की सूचक
महराजगंज से अब शुरू होगी “जन की बात”
कांग्रेस एक जिम्मेदार विपक्ष है इसी कारण यह महमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम सही मुद्दे उठाएँ. जब अर्थव्यवस्था हर मोर्चे पर ध्वस्त हो रही है तो हम मूक दर्शक बन कर नहीं बैठ सकते हैं।बिना वजह सरकार की आलोचना करना हमारा लक्ष्य नहीं है, पर पिछले साढ़े 5 साल में मोदी सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को चौपट कर के बेरोज़गारी बढ़ाई है। 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की रट लगाने वाली इस सरकार के पास आर्थिक मंदी से निपटने के लिए कोई योजना नहीं है।RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि 'सरकार में बैठे लोगों में अर्थव्यवस्था के लिए ना तो कोई स्पष्ट दृष्टिकोण है ना ही इस मुद्दे से निपटने के लिए कोई रणनीति।’
1) विकास के 4 इंजन- निर्यात, खपत, निजी निवेश और सार्वजनिक निवेश. इनमें से निर्यात, खपत और निजी निवेश पूरी तरह ठप्प है, और अकेले जो थोड़ा बहुत सरकारी निवेश है वह विकास की गति बढ़ाने में असमर्थ है।
2) इस वित्त वर्ष (2019-20) की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि मात्र 5% चिंताजनक है। यह केवल एक आँकड़ा नहीं है, यह स्पष्ट संकेत है कम खपत, शून्य निवेश और परिणामस्वरूप बढ़ती बेरोज़गारी का।अक्टूबर माह का नवीनतम GST संग्रह मात्र 95,380 करोड़ रुपये आने वाले संकेत का सूचक है, एक बात साफ़ है लगातार तीसरे महीने 1 लाख करोड़ से कम टैक्स सरकार की घटती आय और राजस्व में घाटे का स्वरूप है।
3) उपभोग, अर्थव्यवस्था में मांग को दर्शाता है, और भारत में उपभोग GDP का 2 / 3 हिस्सा है। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में खपत महज 3.14 प्रतिशत बढ़ा है जो कि 17 तिमाही में सबसे कम है।यह निश्चित रूप से बुरी खबर है और विकास के निम्न स्तर के प्रमुख कारकों में से एक है। कम खपत का मतलब है कम बिक्री जो बदले में कम उत्पादन, कम निवेश और नौकरियों के नष्ट होने की दर्शाता है.
ऑटो सेक्टर ने 11 महीनों तक बिक्री में गिरावट दर्ज की है। लोग खर्च करने से इतना परहेज़ कर रहे हैं कि हाल ही में FMCG उत्पादों जैसे टूथपेस्ट, साबुन, शैम्पू आदि की बिक्री 7 साल में सबसे कम आयी है। पार्लेजी बिस्कुट ने बिक्री में कमी के चलते 10,000 कर्मचारियों की छंटनी की।
4) निवेश आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण तत्व है। सकल फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (GFCF) जो ताजे निवेश का सूचक है, वह 2010-11 के दौरान 39.8 प्रतिशत से घटकर मोदी सरकार के कार्यकाल में 2018-19 में 29.3 प्रतिशत हो गया। निवेश का ना होने का सीधा सम्बन्ध बेरोज़गारी से है, अगर कंपनियां निवेश करेंगी ही नहीं तो नौकरियाँ बनेंगी कहाँ से?
निवेश में विश्वास की ज़रूरत होती है, पर सरकार की कुरीतियाँ, टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा शोषण ने भारतीय उद्योग और सरकार के बीच विश्वास को तो घटाया ही है साथ ही साथ निवेश के माहौल को और कमजोर कर दिया है।
5) अर्थव्यवस्था सिर्फ़ घरेलू मोर्चे पर ही नहीं बल्कि बाहरी व्यापार पर भी चिंताजनक है। सितंबर में निर्यात में 6.57% गिरावट आयी, यह आयात और निर्यात की विफल नीतियों का एक और संकेत है। 30 प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में से 22 ने हाल के रिपोर्ट किए गए आंकड़ों में नकारात्मक वृद्धि क्यों दिखाई है? एक मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए, निर्यात में एक स्वस्थ वृद्धि अति आवश्यक है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश अमेरिका और चीन के बीच वैश्विक व्यापार युद्धों के बड़े लाभार्थी रहे हैं, जबकि निर्यात नीतियों और त्रुटिपूर्ण GST भारत को इस लाभ से वंचित रखा।
6) बेरोज़गारी की दर 8.5 प्रतिशत पर 45 वर्षों में सबसे चरम सीमा पर है। हमारे देश की बेरोज़गारी वैश्विक से भी दोगुनी है।भाजपा सरकार ने भारत के 'जनसांख्यिकीय लाभांश' को 'जनसांख्यिकीय आपदा' में बदल दिया है। रोजगार सृजन करना तो दूर, मोदी सरकार ने लगातार रोजगार नष्ट किए हैं। हाल के ही एक अध्ययन के अनुसार, स्वतंत्र भारत में पहली बार 2011-12 और 2017-18 के बीच 90 लाख नौकरियां नष्ट हुई हैं।
7) जब मंद अर्थव्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र को डुबो रही है, हमारे युवाओं को कोई रोजगार नहीं मिल रहा पर गृह मंत्री अमित शाह के पुत्र जय शाह का व्यवसाय संपन्न है।जय शाह की कम्पनी - कुसुम फिनसर्व की आय, वित्तीय वर्ष 2014 से वित्तीय वर्ष 2019 के बीच 79 लाख रुपये से बढ़ कर 119.61 करोड़ रुपये हुई है। 5 वर्षों में यह 15,000 प्रतिशत की वृद्धि है। वहीं कंपनी की नेटवर्थ वित्त वर्ष 2015 से 2019 के बीच 1.21 करोड़ रुपये से बढ़कर 25.83 करोड़ रुपये हो गई, जो कि 2034 प्रतिशत की शानदार वृद्धि है। जय शाह से इस अभूतपूर्व सफलता का नुस्खा साझा करने का आग्रह है
8) भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में मात्र 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
आय दोगुनी करने का झूठा वादा करने वाली इस सरकार को शायद किसान की मुश्किलों का अंदाज़ा भी नहीं है। किसान को अपनी उपज का सही दाम नहीं मिल रहा, आय में निरंतर गिरावट है पर उपयोग की वस्तुएँ और महँगी होती जा रही हैं।
9) अच्छी सुर्ख़ियों की दीवानगी से ग्रसित भाजपा सरकार ने ग़लत निर्णयों की झड़ी लगा दी है। जब किसान और उपभोक्ताओं की जेब में पैसा डालने का समय था तब कॉर्पोरेट टैक्स काट कर राजस्व को 1.5 लाख करोड़ रुपये का घाटा कराने का काम किया गया।
10) कच्चे तेल में गिरावट के बावजूद आज पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें सबसे अधिक हैं. रसोई गैस सिलेंडर में लगातार वृद्धि करने में भी सरकार को कोई संकोच नहीं होता है, 1 नवंबर को निरंतर तीसरे महीने क़ीमतें बढ़ा दो गयीं.
11) इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ख़र्चा करने का दम्भ भरना इस सरकार का फिर एक सफ़ेद झूठ है। हाल ही में आँकड़े बताते हैं कि भारत का मुख्य बुनियादी ढाँचा उत्पादन (इन्फ़्रस्ट्रक्चर आउट्पुट) में लगातार दूसरे महीने 5.2 प्रतिशत की गिरावट आयी, जो पिछले 14 वर्षों में सबसे कम था। यह संकुचन अर्थव्यवस्था में तीव्र कमजोरी का परिचायक है। इन आठ मुख्य अवसंरचना उद्योगों के सूचकांक - जिनमें कोयला, कच्चे तेल, रिफाइनरी उत्पादों, प्राकृतिक गैस, सीमेंट, स्टील, बिजली और उर्वरकों का उत्पादन शामिल है, IIP का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं।
12) नोटबंदी और एक गड़बड़ GST के बाद अर्थव्यवस्था पर सरकार का एक बड़ा प्रहार होते होते बच गया। RCEP के रूप में मोदी सरकार चीन समेत 16 एशियाई देशों के साथ समझौता करने की कगार पर थी, पर कांग्रेस के विपक्ष बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा। यह किसानों, दुकानदारों, छोटे और मध्यम उद्यमों पर एक बड़ा हमला है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी ख़तरा था। सरकार की मनमानी के चलते इस गम्भीर आर्थिक संकट के दौरान 72 वर्षों में पहली बार हम चीन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौता करने से कुछ ही दूर थे।
13) विकास को लेकर केवल विपक्ष ही नहीं चिंतित हैं। रेटिंग एजेन्सीयाँ जैसे कि Moody’s, S&P, Fitch के साथ ही साथ ADB, OECD, IMF, RBI जैसे संस्थानों ने भी हमारे विकास की अनुमानित डर की घटा दिया है।
कई चेतावनियों के बावजूद सरकार अपने घमंड और अनभिज्ञता के चलते में अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए विषय वस्तु विशेषज्ञों से विचार विमर्श करने के लिए तत्पर नहीं हैं। प्रधान मंत्री और उनकी सरकार ने जनादेश की गँवा कर देश की आर्थिक संकट में धकेल दिया गई। मोदी सरकार एलिस इन वंडरलैंड की तरह दिखती है - हतप्रभ, बेखबर और आर्थिक मंदी का खंडन करते हुए। पर इस घमंड और अज्ञान की बड़ी क़ीमत हम सबको चुकानी पड़ रही

