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Wednesday, 26 December 2018

अभय पासवान

नईदिल्ली (आरएनएस)। राजधानी पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक बड़े एजुकेशन फर्जीवाड़े का किया भंडाफोड़


आर पी पी न्यूज़ : सवांददाता अभय पासवान : राजधानी पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक बड़े एजुकेशन फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ किया है. क्राइम ब्रांच ने राजधानी में चल रहे फर्जी एजुकेशन बोर्ड को चलाने वाले मास्टरमाइंड अल्ताफ राजा सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया है. देश भर के करीब 200 स्कूल और इंस्टीट्यूट इस बोर्ड के साथ जुड़े थे. वहीं यह बोर्ड देशभर में अभी तक 55 हजार बच्चों को फर्जी बोर्ड की नकली मार्कशीट भी बेच चुका है.

    क्राइम ब्रांच के मुताबिक राजधानी दिल्ली में दिल्ली हायर सेकेंडरी एजुकेशन बोर्ड के नाम से चल रहे इस बोर्ड से 2000 से लेकर 10 हजार रुपए तक में 10वीं और 12 वीं की नकली मार्कशीट दी जा रही थीं. पुलिस का कहना है कि करीब 26 स्कूलों पर गाज गिर सकती है. इसी संबंध में गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी क्राइम ब्रांच की छापेमारी चल रही है.
   खुफिया सूचना पर क्राइम ब्रांच ने फर्जी छात्र के परिजन बनकर बोर्ड से 10वीं और 12 वीं की मार्कशीट बनवाई. जिसके बाद इस फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ. अभी इस मामले में और लोगों की गिरफ्तारी होनी है|
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Tuesday, 18 December 2018

अभय पासवान

अब बैंक अकाउंट्स और सिम के लिए जरूरी नहीं होगा आधार कार्ड, कानून में संशोधन को मिली मंजूरी

नई दिल्ली  (आरएनएस)। आधार नंबर को मोबाइल नंबरों और बैंक अकाउंट्स से लिंक करने को वैधता प्रदान करने के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 2 मौजूदा कानूनों में संशोधनों के विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी। सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में टेलिग्राफ ऐक्ट और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट में संशोधन के मसौदे को मंजूरी दी गई।
   गौर हो कि सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर अपने ऐतिहासिक फैसले में प्राइवेट कंपनियों द्वारा ऑनलाइन आधार ऑथेंटिकेशन पर इस साल सितंबर में प्रतिबंध लगा दिया था। कोर्ट के फैसले के बाद दूरसंचार और फिनटेक कंपनियों ने सरकार से आधार के इस्तेमाल पर प्रतिबंध से छूट की गुहार लगाई थी। सूत्रों के मुताबिक, दोनों मौजूदा कानूनों में प्रस्तावित संशोधन हो जाने के बाद कोई व्यक्ति नए मोबाइल फोन कनेक्शन लेने और बैंक अकाउंट खोलने के लिए 12 अंक वाली पहचान संख्या को अपनी मर्जी से साझा कर सकेगा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला, इसमें आड़े नहीं आएगा।
   सुप्रीम कोर्ट ने आधार ऐक्ट के सेक्शन 57 को खारिज कर दिया था, जिसके तहत सिम कार्ड और बैंक खातों के साथ आधार लिंकिंग अनिवार्य थी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इस प्रावधान का कोई कानूनी आधार नहीं है। यही वजह है कि आधार के जरिए मोबाइल सिम जारी किए जाने को कानूनी समर्थन उपलब्ध कराने के लिए टेलिग्राफ ऐक्ट को संशोधित किया जा रहा है।
   इसी तरह, पीएमएलए में संशोधन के बाद लोगों के पास केवाईसी के लिए अपने बैंक अकाउंट को आधार कार्ड से लिंक कराने का विकल्प उपलब्ध होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आधार की संवैधानिक वैधता पर मुहर लगाते हुए कहा था कि सरकार द्वारा प्रायोजित कल्याणकारी योजनाओं की सब्सिडी के लिए के लिए इसे जरूरी बताया था। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि बैंक अकाउंट खोलने या मोबाइल फोन कनेक्शन लेने के लिए आधार को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह फैसला प्रिवेसी की चिंताओं को लेकर दाखिल की गईं याचिकाओं पर दिया था।
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अभय पासवान

नरसंहार मामलों से निपटने अलग कानून की जरूरत: दिल्ली हाईकोर्ट का निर्देश

नई दिल्ली  (आरएनएस)। 1984 सिख विरोधी दंगे के मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए हाई कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए देश के आपराधिक कानून में बदलाव की जरूरत बताई है। सोमवार को हाई कोर्ट ने कहा कि मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार जैसे इन मामलों से निपटने के लिए अलग से कानून की जरूरत है। कानून में लूपहोल के चलते ऐसे नरसंहार के अपराधी केस चलने और सजा मिलने से बच निकलते हैं।
    जस्टिस एस. मुरलीधर और विनोद गोयल की बेंच ने कांग्रेस लीडर सज्जन कुमार को दोषी करार देते हुए कहा कि ऐसे मामलों के लिए अलग से कोई कानूनी एजेंसी न होने का ही अपराधियों को फायदा मिला और वे दशकों तक बचे रहे। कुमार को हत्या और साजिश रचने का दोषी करार देते हुए बेंच ने कहा, ऐसे मामलों को मास क्राइम के बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। इसके लिए अलग ही अप्रोच की जरूरत है।
   बेंच ने कहा कि सिख दंगों में दिल्ली में 2,733 लोगों और पूरे देश में 3,350 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। मास क्राइम का न तो यह मामला था और न ही यह आखिरी था। कोर्ट ने अपनी बात के पक्ष में मुंबई में 1993 के दंगों, 2002 के गुजरात दंगों, ओडिशा के कंधमाल में 2008 को हुई हिंसा और मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए दंगे का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि ये कुछ उदाहरण हैं, जहां अल्पसंख्यकों को टारगेट किया गया। यही नहीं ऐसे मामलों को अंजाम देने में सक्रिय रहे राजनीतिक तत्वों को कानून लागू कराने वाली एजेंसियों की ओर से संरक्षण देने का काम किया गया।
   अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए देश के लीगल सिस्टम को मजबूत किए जाने की जरूरत है ताकि मानवता के खिलाफ अपराध के मामलों में बिना समय गंवाए केस बढ़ाया जा सके। अदालत ने कहा कि नरसंहार के ऐसे मामलों ने पूरी मानवता को झकझोरने का काम किया।
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