अकीदत के साथ मनाया जारहा है कुर्बानी का त्योहार।
कुर्बानी के त्योहार से सीधा लाभ जुड़ा है गरीबों का
आर पी पी न्यूज़ : वरिष्ठ सवांददाता रिज़वानुल्लाह खान -महराजगंज (परतावल) कुर्बानी मुस्लिम धर्म की एक बहुत बड़ी परम्परा है मान्यता है कि पैगम्बर हज़रत इब्राहीम को अल्लाह ने अपना खलील,(दोस्त) कहा जब बुढापे में उन के यहां एक बेटे हज़रत इस्माइल पैदा हुए तो उनसे बहुत ज़्यादा प्यार करने लगे जिस पर फरिश्तों ने अल्लाह से कहा कि ऐ अल्लाह तेरे खलील अब तुम से अधिक प्यार अपने बेटे से करते हैं तब अल्लाह ने उनका इम्तहान लिया और बेटे की अपनी राह में कुर्बानी का हुक्म दिया जिस पर हज़रत इब्राहीम ने बेटे की कुर्बानी का निश्चय किया और कुर्बानी करने के लिए उन के गले पर छुरी भी चलाई परन्तु अल्लाह को उनका इम्तहान लेना और फ़रिशतो को बताना था की वह सिर्फ अपने रब से ही प्यार करते है ,इस कारण उनकी जगह जन्नत से दुंबा भेज कर कुर्बानी करादी,आज उन की इसी सुन्नत पर अमल करने का हुक्म तमाम मालदार मुसलमानों को अल्लाह ने दिया है,पूरी दुनिया में कुर्बानी की जाती है जिस से एक तरफ जहां एक फ़रीज़ा अदा होता है वहीं दूसरी तरफ उन तमाम लोगों को गोश्त खाने का भी मौका मिल जाता है जिन्हें साल में कभी कभार मिलता है ,क़ुरबानी के गोश्त को तीन हिस्सा करने का हुक्म दिया गया है जिस में एक हिस्सा गरीबों मिस्कीनों को देने का हुक्म दिया गया है ,क़ुरबानी त्याग बलिदान और सत्य का प्रतीक है,हम सब को चाहिए कि जानवर की कुर्बानी करने के साथ ही किना बोग़ज़ हसद जलन,गीबत चुगली,मक्कारी रियाकारी,और दूसरी बुराइयों को भी अपने अंदर से निकाल दें और अल्लाह से तौबा कर नेक इंसान बनने की दुआ करें।
अब आइए देखते है कि कुर्बानी का समाज मे क्या लाभ है ।मुर्बानी ही एक ऐसा त्योहार है जिस का सीधा लाभ गरीबों तक ही पहुंचता है इस लिए की अपने देश भारत में बकरा बकरी पालन देश का सबसे कमजोर तबका करता है, गांव में ऐसे लोग जिनके पास खेती बाड़ी नहीं है और आवक का कोई साधन नहीं है वह दो तीन बकरियां पाल लेते हैं और उन्हें दिन भर जंगलों में चराते हैं और हर साल उन बकरियों से चार पांच बच्चे होते हैं जिन्हें बेचकर वह अपने घर का खर्च चलाते हैं।
जब किसी की बकरी के बकरा होता है तो खुश हो जाते हैं कि चलो इसे बकरा ईद मे बेचेंगे अच्छा पैसा मिलेगा।
यानी बकरा ईद एक ऐसा त्योहार है जिसमें पैसे वालों का हजारों करोड़ रुपए सीधा देश के सबसे ग़रीब तबके के पास जाता है बाकी सभी त्योहारों में सिर्फ पूंजीपतियों का ही भला होता है।
बकरों के साथ तेल की बिक्री बढ़ती है जिससे सीधा तिलहन की खेती करने वाले किसानों का भला होता है।
प्याज की बिक्री बढ़ती है किसानों का भला होता है।
गरम मसालों की बिक्री बढ़ती है किसानों का भला होता है।
यानी कुल मिलाकर बकरा ईद के त्योहार में पूंजीपतियों का नहीं आम लोगों का ही बिजनेस चलता है जिससे पूंजीपतियों को तकलीफ हो रही है और वह चाहते हैं कि बकरा ईद में बकरे नहीं केक काटे जांए और उनका भला हो।
जब किसी गरीब का बकरा अच्छे दामों में बिकता है फिर उसके चेहरे पर खुशी देखना चेहरे में कैसी रौनक आ जाती है।
कुर्बानी के त्योहार से सीधा लाभ जुड़ा है गरीबों का
आर पी पी न्यूज़ : वरिष्ठ सवांददाता रिज़वानुल्लाह खान -महराजगंज (परतावल) कुर्बानी मुस्लिम धर्म की एक बहुत बड़ी परम्परा है मान्यता है कि पैगम्बर हज़रत इब्राहीम को अल्लाह ने अपना खलील,(दोस्त) कहा जब बुढापे में उन के यहां एक बेटे हज़रत इस्माइल पैदा हुए तो उनसे बहुत ज़्यादा प्यार करने लगे जिस पर फरिश्तों ने अल्लाह से कहा कि ऐ अल्लाह तेरे खलील अब तुम से अधिक प्यार अपने बेटे से करते हैं तब अल्लाह ने उनका इम्तहान लिया और बेटे की अपनी राह में कुर्बानी का हुक्म दिया जिस पर हज़रत इब्राहीम ने बेटे की कुर्बानी का निश्चय किया और कुर्बानी करने के लिए उन के गले पर छुरी भी चलाई परन्तु अल्लाह को उनका इम्तहान लेना और फ़रिशतो को बताना था की वह सिर्फ अपने रब से ही प्यार करते है ,इस कारण उनकी जगह जन्नत से दुंबा भेज कर कुर्बानी करादी,आज उन की इसी सुन्नत पर अमल करने का हुक्म तमाम मालदार मुसलमानों को अल्लाह ने दिया है,पूरी दुनिया में कुर्बानी की जाती है जिस से एक तरफ जहां एक फ़रीज़ा अदा होता है वहीं दूसरी तरफ उन तमाम लोगों को गोश्त खाने का भी मौका मिल जाता है जिन्हें साल में कभी कभार मिलता है ,क़ुरबानी के गोश्त को तीन हिस्सा करने का हुक्म दिया गया है जिस में एक हिस्सा गरीबों मिस्कीनों को देने का हुक्म दिया गया है ,क़ुरबानी त्याग बलिदान और सत्य का प्रतीक है,हम सब को चाहिए कि जानवर की कुर्बानी करने के साथ ही किना बोग़ज़ हसद जलन,गीबत चुगली,मक्कारी रियाकारी,और दूसरी बुराइयों को भी अपने अंदर से निकाल दें और अल्लाह से तौबा कर नेक इंसान बनने की दुआ करें।
अब आइए देखते है कि कुर्बानी का समाज मे क्या लाभ है ।मुर्बानी ही एक ऐसा त्योहार है जिस का सीधा लाभ गरीबों तक ही पहुंचता है इस लिए की अपने देश भारत में बकरा बकरी पालन देश का सबसे कमजोर तबका करता है, गांव में ऐसे लोग जिनके पास खेती बाड़ी नहीं है और आवक का कोई साधन नहीं है वह दो तीन बकरियां पाल लेते हैं और उन्हें दिन भर जंगलों में चराते हैं और हर साल उन बकरियों से चार पांच बच्चे होते हैं जिन्हें बेचकर वह अपने घर का खर्च चलाते हैं।
जब किसी की बकरी के बकरा होता है तो खुश हो जाते हैं कि चलो इसे बकरा ईद मे बेचेंगे अच्छा पैसा मिलेगा।
यानी बकरा ईद एक ऐसा त्योहार है जिसमें पैसे वालों का हजारों करोड़ रुपए सीधा देश के सबसे ग़रीब तबके के पास जाता है बाकी सभी त्योहारों में सिर्फ पूंजीपतियों का ही भला होता है।
बकरों के साथ तेल की बिक्री बढ़ती है जिससे सीधा तिलहन की खेती करने वाले किसानों का भला होता है।
प्याज की बिक्री बढ़ती है किसानों का भला होता है।
गरम मसालों की बिक्री बढ़ती है किसानों का भला होता है।
यानी कुल मिलाकर बकरा ईद के त्योहार में पूंजीपतियों का नहीं आम लोगों का ही बिजनेस चलता है जिससे पूंजीपतियों को तकलीफ हो रही है और वह चाहते हैं कि बकरा ईद में बकरे नहीं केक काटे जांए और उनका भला हो।
जब किसी गरीब का बकरा अच्छे दामों में बिकता है फिर उसके चेहरे पर खुशी देखना चेहरे में कैसी रौनक आ जाती है।

