आर पी पी न्यूज़ : मसालुद्दीन की रिपोर्ट - पराली बनी अन्नदाता के गले की फांस। किसान रबी फसल के बोआई में हो रही देरी से हुए चिंतित। कोर्ट द्वारा तय किया गया आर्थिक सहयोग के सुझाव पर टीकी अन्नदाता की नजर।
उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ सालों से सर्दी के दिनों में हो रहे प्रदूषण से परेशान केन्द्र सरकार ने माना कि किसानों द्वारा धान की फसल कटने के बाद जो अवशेष पराली को जलाने को एक अहम कारण मानते हुए तथा उसके रोकथाम के लिए हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में फसलों के पराली जलाने पर रोक लगाते हुए आर्थिक व अन्य दण्ड के प्रावधान बनाएं हैं। जिसके बाद कई राज्यों में सैकड़ों किसानों पर राज्य सरकारें कार्यवाही करते हुए मुकदमे निरूद्ध किए गए हैं।वही दूसरी तरफ केन्द्र व राज्य सरकारों के सख्ती से अन्नदाता परेशान हैं। गौरतलब है कि धान की कटाई और रबी फसलों की बोआई के लिए किसानों को बहुत कम समय मिलता है और इन दिनों किसान को कई कृषि संबंधी कार्य होते हैं। ऐसे में किसान अपने खेतों से पराली हटाने में लग रहे समय, लागत और खेतों की जाती हुई नमी से चिंतित हैं। किसानों कहना है कि का रबी फसल की उत्तम बोआई 1 नवम्बर से 15 दिसंबर तक मानी जाती है, लेकिन बोआई उक्त समय में होती नजर नहीं आ रही है। तथा लेट लतीफ बोआई से लागत अधिक लगेगा और पैदावार कम होगा। किसानों का यह भी कहना है कि प्रदूषण की समस्या जब कुछ सालों से है तो सरकार क्यों नहीं ऐसी योजना बनाई और ऐसे उपकरण किसानों को क्यों नहीं उपलब्ध कराए तथा आर्थिक सहयोग जो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो सुझाव दिया है उसे किसानों को राज्य सरकारों की तरफ से क्यों नहीं दिया जा रहा है। जिससे किसानों के उपर नाकारात्मक प्रभाव न पड़े।

